Kahan divya desna

स्वानुभव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पांच लब्धियां
प्रायोग्य लब्धि
धर्म के साथ कोई ऐसी बात नहीं है कि आज करो और फल चार दिन बाद मिले (यह बात पुण्य के साथ है )| धर्म रूप तुम अभी हो जाओ और अभी शान्ति की प्राप्ति कर लो | देख, कहीं एक समय भी , एक क्षण भी , व्यर्थ न चला जाय | वह बाहर नहीं , तू ही है , इसलिए तू उसे पा सकता है | इन चर्म-चक्षुयों से नहीं दीखेगा , उसे देखने के लिए तो तुझे भीतर की आँखें खोलनी होगी | भीतरी आँखें खोलने पर तुझे ज्ञानरूपी समुद्र स्वयं का आह्वान करता हुआ प्रतीत होगा कि आओ , मुझमें मग्न हो जाओ , अनंतकाल से भीषण गर्मी में संतप्त हुए तुम घूम रहे थे और मुझे तुमने पाया नहीं , अब तुमने बड़े यत्न से मुझे पाया , देखते क्या हो दूर से , लगा लो डुबकी , डूब जाओ इस आनंद के , ज्ञान के सागर , मुझमें | जैसे कोई स्वच्छ निर्मल जल से भरा हुआ तालाब हो औए अत्यंत गर्मी में झुलसा हुआ कोई आदमी वहाँ आय और उसकी शीतलता, स्वच्छता, व् निर्मलता को देखकर अनायास ही उसके मुँह से निकल पड़े - अरे ; यह तो मुझे ही बुला रहा है कि स्नान कर , अपना ताप बुझाने के लिए |
इसी प्रकार आचार्य कुन्दकुन्द कह रहे है कि इस अमूल्य अवसर को खो मत देना | कहीं पुण्य के फल में आसक्त मत हो जाना | यह सबसे बड़ा धोखा है जो व्यक्ति स्वयं को दे लिया करता है , इसे तूने अनंत बार भोग है , ज्ञानियों ने , चक्रवर्तियों ने इसे पाप समझकर छोड़ा है | बड़ी मुश्किल से यह मौका तेरे हाथ आया है, अतः " कथमपि मृत्वा "
- किसी भी प्रकार से मर कर भी उस तत्व की प्राप्ति कर ले | अगर अगले जन्म पर छोड़ेगा तो फिर अनंत जन्म लेने पड़ेंगे | ज्ञानी की श्रद्धा में एक भी भव नहीं, वह एक क्षण भी ठहरना नहीं चाहता , असमर्थता (आत्मबल की कमी ) की वजह से चाहे अनेक जन्म धारण करने पड़े |
इस प्रकार आचार्य कुन्दकुन्द व् आचार्य अमृतचन्द के समान किसी ज्ञानी की ऐसी दिव्य-देशना को सुन कर यदि इसे यह समझ में आये कि आज तक मैंने बड़ी भूल की थी जो संसार-शरीर-भोगों की तरफ तो मैंने मुंह किया हुआ था और भगवान् आत्मा की ओर पीठ की हुई थी , और परमात्मा बनने का निर्णय करके यह अपनी तत्व सम्बन्धी रूचि में तीव्रता लावे तो कषायों में (क्रोध-मान-माया-लोभ) और अधिक मंदता हो , "प्रायोग्य लब्धि " हो और फिर इसका आत्मा के अनुभव का पुरुषार्थ जागृत हो | यहाँ तक चार लब्धियां हुईं , और यहाँ तक भी यह जीव अनंत बार आ चुका है | पांचवी करण लब्धि तो तब होगी जब यह अपने को अपने में ही खोजेगा और स्वानुभव होगा |
स्वानुभव ही सम्यग्दर्शन है , वहीँ सम्यग्ज्ञान है और वही मोक्ष के मार्ग की शुरुवात है , वह सब कुछ है | मैं चेतन ज्ञानदर्शन मयी हूँ, विचारना...........................