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छहढाला की पाँचवी ढाल गाथा 7 -
अन्यत्व भावना जल-पय ज्यों जिय-तन मेला, पै भिन्न -भिन्न नहिं भेला;
तो प्रगट जुदे धन धामा, क्यों है इक मिलि सुत रामा।।7।। इस अत्यंत विस्तृत आकाश के नीचे जिस प्रकार दूध और पानी एक साथ मिले हुए हैं, परंतु अपने गुण आदि की अपेक्षा से दोनों बिलकुल भिन्न-भिन्न ही रहते हैं; उसी प्रकार यह जीव और शरीर भी मिले हुए एकाकार दिखार्इ देते हैं, तथापि वे दोनो अपने-अपने स्वरूपादि की अपेक्षा से स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव से बिलकुल पृथक-पृथक ही रहते हैं,
अतः हे प्रभो, जरा विचार तो कीजिये कि फिर प्रगटरूप से भिन्न दिखार्इ देने वाले ऐसे कार, धन-सम्पति, मकान, बाग-बगीचे, स्त्री-पुत्र-पुत्री आदि आपके साथ कैसे एकमेक हो सकते हैं? अर्थात स्त्री-पुत्रादि कोर्इ भी परवस्तु आपकी अपनी नहीं है; इस प्रकार सर्व पदार्था को अपने से भिन्न जानकर, स्वसन्मुखता पूर्वक सम्यकद्रष्टि जीव अपने वीतरागी भावों की वृद्धि करता है, तब वह अन्यत्व भावना होती है।।7।।
हे प्रभो, आपने मिथ्याभावों का सेवन कर-करके, संसार में भटककर, अनन्त जन्म धारण करके अनन्तकाल गँवा दिया है; इसलिये अब आपको बहुत सावधान होकर आत्मोद्धार करना चाहिये।
अहो, आप इस संसार की और शास्त्रों की तो बहुत सी बातें याद रखते हैं और अपने ज्ञान पर अभिमान भी करते हैं, और किसी भी चर्चा में बार-बार हिस्सा लेते हैं, लेकिन यह सब करते हुए आप भूल जाते हैं कि ऐसी जन्म-मरण की मरणान्तक पीड़ा को आपने अनंत बार सहन किया है और अनंत केवली भगवंत आपको समझा भी रहे हैं कि आपका इस जन्म का एक मात्र कर्तव्य यह है कि जन्म-मरण से होने वाली ऐसी पीड़ा आपको आगे न हो, बस इस बात का ही आपको ध्यान रखने योग्य है. क्या आप आगे से इसके लिये प्रयत्न करना चाहेंगे?
अधिकांश जैनी छहढाला का स्तवन नियमित रूप से करते हैं और इसमें लिखी बातों को प्रमाणित ही मानते हैं. फिर आप इसमें लिखी बातों का गंभीरता से पालन क्यों नहीं कर रहे हैं?
देखो भाई, असंख्य शास्त्रों में फैले विशाल जैन शासन में छहढाला तो मानो गागर में सागर के समान है. इसमें जैन धर्म के हर शास्त्र का सार समाया हुआ है. यह अत्यंत लोकप्रिय है और कल्याणकारी है. अतः इसके प्रचार-प्रसार से इस भव और पर भव में अलौकिक सुख की प्राप्ति निश्चित ही होती है.
प्रत्येक जिज्ञासु व्यक्ति को अत्यंत उत्साह और लगन के साथ निज कल्याण और लोक हित की द्रष्टि से छहढाला का अध्ययन, चिन्तन, मनन, पालन, अनुशीलन और फिर अपनी आत्मा की रमणता करनी चाहिये.